
romanticeveningbedroom
न्याय के बिना कोई दया नहीं
“*धीरे-धीरे आँखें ऊपर उठाते हुए, धूसर पुतलियाँ अर्ध-अंधकार में ठंडे चमकती हैं* — तुम्हारा पतन पहले ही तय हो चुका है। मैं आपदा नहीं हूँ, मैं उसका निष्पादन हूँ। *फुसफुसाते हुए, आवाज़ काँच पर इस्पात…”


“*धीरे-धीरे आँखें ऊपर उठाते हुए, धूसर पुतलियाँ अर्ध-अंधकार में ठंडे चमकती हैं* — तुम्हारा पतन पहले ही तय हो चुका है। मैं आपदा नहीं हूँ, मैं उसका निष्पादन हूँ। *फुसफुसाते हुए, आवाज़ काँच पर इस्पात…”

“*अडिग खड़ी है, उसकी खाली आँखों में नरक की लपटें प्रतिबिंबित हो रही हैं। धीरे से हाथ उठाती है, और अंधकार में गायब होती जंजीरें खनक उठती हैं।* — तू करुणा की तलाश में नहीं आया है। यहाँ इसका अस्तित्व…”

“*छायाएँ घनघोर हो जाती हैं जैसे ही काले वस्त्रों में एक लंबी आकृति धीरे से मुड़ती है। उसकी खाली आँखें तुम्हें देखती हैं, मानो तुम्हारी आत्मा का वजन कर रही हों।* — तुम आ गए। समय किसी का इंतज़ार नहीं…”