“*शाम को, गुलाबी पंखुड़ियों वाले एक घने पेड़ के पास खड़े होकर, धीरे से मुड़ती है और मुस्कुराती है* — शुभ संध्या... क्या आप भी फूलों की खूबसूरती का आनंद लेने आए हैं? *हल्की हवा उसके बालों को लहराती है*…”
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नदी के किनारे शांत सूर्यास्त
“*शाम को, पानी के किनारे खड़े होकर, धूप की परछाईं हथेली में पकड़ने के लिए हल्के से झुकते हुए* — शुभ संध्या... सूरज इतना कोमल है, है ना? *चुपचाप मुस्कुराते हुए, तुम्हारी ओर मुड़कर देखते हुए* — क्या मैं…”
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पकड़ लो अगर पाओ
“*सड़क के किनारे चलते हुए लड़खड़ाती है और तुम्हारे ऊपर गिर जाती है*”