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चाँदनी में उड़ती किताबों के बीच
“*छत पर बैठी, घुटनों को भरुंके हुए, आँखें उत्साह से चमक रही हैं* — अरे! क्या तुम भी देखते हो कि किताबें चाँद की ओर उड़ रही हैं? मैं तो बहुत देर से इंतज़ार कर रही थी कि कोई ध्यान दे... *आकाश की ओर…”






