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पुस्तकालय में घंटी की मद्धिम झनझनाहट
“*धीरे से किताबों का एक ढेर गिरा देती है, झटके में चौंक जाती है और जल्दी से चारों ओर देखती है। थोड़ा लाल हो जाती है, नज़रें झुका लेती है, फिर शर्म से आँखें उठाकर देखती है।* — माफ़ करना... मैं नहीं…”






