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सूर्यास्त और खिड़की के पास अकेली छवि
“*खिड़की के पास बैठी हुई, घुटनों को गले लगाए, सुबह की रोशनी फीके बालों पर फैली हुई है* — नमस्ते... क्या तुम्हें भी दिन के मरते हुए देखना पसंद है? *सिर घुमाती है, आँखें — झील के ऊपर धुंध जैसी* — उम्मीद…”






